AJ Prakashan Ltd

AJ Prakashan Ltd आज’ (१९२०) संस्थापक - राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त संस्थापना दिवस- ५ सितम्बर, १९२० आज’ के विस्तारीकरण की प्रक्रिया १९७७ से शुरू हुई। कानपुर से ‘आज’ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके बाद उत्तर प्रदेश में आगरा, गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, बरेली से भी ‘आज’ प्रकाशित होने लगा। बिहार में पटना, रांची, धनबाद, जमशेदपुर से ‘आज’ का प्रकाशन होता है। ‘आज’ के सभी संस्करण कम्प्यूटर, फैक्स, मोडम, इण्टरनेट और अति आधुनिक छपाई मशीनों से लैस हैं। सूचना एवं प्रौद्योगि की के क्षेत्र में जो क्रान्ति आयी है, उससे कदम से कदम मिलाकर ‘आज’ आगे बढ़ रहा है। इसकी प्रसार संख्या निरन्तर बढ़ रही है। सभी संस्करणों में साप्ताहिक विशेषांक नियमित रूप से और विभिन्न विषयों पर परिशिष्ट समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। ‘आज’ ने हमेशा जनता की आवाज बुलन्द की है। आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी। अवरोधों के बावजूद वह कभी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुआ। ‘आज’ आज भी भारतीय जनता की आवाज है। सन् १९२० में ही यानी आज से ९४ साल पहले ‘आज’ ने अपने एक सम्पादकीय में जो लिखा था, वह आज भी एकदम सत्य है। यह ‘आज’ की परम्परागत दूरदृष्टि का प्रतीक है। सम्पादकीय इस प्रकार है- ‘संसार इस समय बेचैन है। चारों ओर हलचल है। सब नर-नारीपरेशान हैं। क्यों? राष्ट्रनीतिज्ञों को इसका कारण विचार कर निकालना चाहिए। जिधर देखिये उसी ओर अशान्ति विराज रही है। सब लोग एक दूसरे से अप्रसन्न हैं। अपनी-अपनी श्रेणी को संघटित कर सब लोग दूसरी श्रेणियों से लडऩे के लिए तैयार हैं। इस हलचल में केवल एक सिद्धान्त है- जिसके पास अधिकार है, उससे अधिकार ले लेना चाहिए। जिसके पास अधिकार नहीं है, वह दूसरों को अधिकार प्राप्त देखकर जलता है और उसके पास से अधिकार हटवाना चाहता है। अनाधिकारी अधिकारी से द्वेष करता है और अधिकारी अनाधिकारियों की संख्या देख उनसे डरता है, उनकी संघटित शक्ति घटाना चाहता है और उनके प्रति रोष दिखाकर उन्हें अधीन अवस्था में ही पड़े रहने का आदेश देता है। राष्ट्र-राष्ट्र, वर्ग-वर्ग, वर्ण-वर्ण सबके झगड़े का मूल मन्त्र यही प्रतीत होता है कि अधिकारी के पास अधिकार न हो। अधिकार हटाया जाना चाहिए। तो शान्ति कैसे हो सकती है, चैन कैसे मिल सकता है? शासन और शासित, मालिक और मजदूर, अमीर और गरीब अपने-अपने हक और फर्ज दोनों को जब तक अच्छी तरह नहीं समझते, तब तक नीति नहीं हो सकती। दो परस्पर विरोधी श्रेणियों को यह सच समझना होगा।’ आज’ का नाम ‘आज’ ही क्यों ‘आज’ के नामकरण के बारे में कहा गया- हमारा पत्र दैनिक है। प्रत्येक दिन इसका प्रकाशन होगा। संसार भर केनये-नये समाचार इसमें रहेंगे। दिन-प्रतिदिन संसार की बदलती हुई दशा में नये-नये विचार उपस्थित करने की आवश्यकता होगी। हम इस बात का साहस नहीं कर सकते कि हम सर्वकाल, सर्वदेश, सर्वावस्था के लिए जो उचित, युक्त और सत्य होगा, वही सर्वदा कहेंगे। हमें रोज-रोज अपना मत तत्काल स्थिर करके बड़ी-छोटी सब प्रकार की समस्याओं को समयानुसार हल करना होगा। जिस क्षण जैसी आवश्यकता पड़ेगी, उसी की पूर्ति का उपाय सोचना और प्रचार करना होगा। अतएव हम एक ही रोज की जिम्मेदारी प्रत्येक अंक मेंले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक अंक में ले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक दिन केवल आज की होगी, इस कारण इस पत्र का नाम ‘आज’ है। कुछ अन्य प्रकाशन (१) सोमवारविशेषांक- ‘आज’ के सोमवार विशेषांक का प्रकाशन १९४४ में शुरू हुआ। (२) स्वार्थ-ज्ञानमण्डल से ‘स्वार्थ’ पत्रका प्रकाशन शुरू हुआ था। दो-ढाई वर्ष तक चलने के बाद आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसे बन्द करना पड़ा। (३) मर्यादा- १९२१ में ज्ञानमण्डल ने इस मासिक पत्रिका का अधिग्रहण किया और श्री सम्पूर्णानन्द के सम्पादकत्व में इसका प्रकाशन शुरू हुआ। (४) साप्ताहिक ‘आज’- १८ जुलाई, १९३८ सेसाप्ताहिक आजका प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। (५) समाज- इस का प्रकाशन १९४७ में शुरू हुआ। इसके सम्पादक मण्डल में आचार्य नरेन्द्रदेव भी थे। १अक्तूबर, १९५० से इसका प्रकाशन बन्द कर दिया गया। (६) चित्ररेखा- यहउ च्च कोटि की कहानी की पत्रिका थी। ज्ञानमण्डल से इसका प्रकाशन नवम्बर, १९४७ में शुरू हुआ। कुछ ही अंक प्रकाशित करने के बाद इसे बन्द कर देना पड़ा। (७) अंग्रेजीदैनिक ‘टुडे’- ३० जुलाई, १९३१ को इसदैनिकका प्रकाशनारम्भ हुआ था। श्री सम्पूर्णानन्द इसके सम्पादक थे। अपनी छोटी-सीजिन्दगीमें ही यह पत्र अहिन्दी-भाषियों में काफी लोकप्रिय हुआ। (८) ‘अवकाश’ हिन्दी पाक्षिक-अप्रैल, १९७९ मेंश्रीरामनवमीके दिन श्री शार्दूल विक्रम गुप्तके सम्पदकत्वमें इसका प्रकाशन शुरूहुआ। लगभग दस सालतक यह पत्रिका खूल चली। इसकी प्रसार संख्या सवा लाख तक पहुंच चुकी थी। बाद में इसे बन्द कर दिया गया। ज्ञानमण्डल (प्रकाशन संस्थान) राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त के हृदय में हिन्दी के प्रति असीम अनुराग था। उनकी आकांक्षा थी कि विश्व का समस्त ज्ञान हिन्दीमें भी प्रस्तुत किया जायऔर हिन्दी साहित्यकी उन्नतिमें समुचित योगदान करनेके उद्देश्यसे ऐसी संस्थास्थापित की जाय जो एकमात्र इसी उद्देश्यको लेकर प्रकाशन-कार्य आरम्भ करे। अपनी इसआकांक्षाको मूर्तिमान करनेके लिए उन्होंने सन्ï १९१६ मेंज्ञानमण्डल नामक प्रकाशन संस्था की स्थापना की और इस कार्यके लिए ज्ञानमण्डलके हीनामसे एक बड़ा मुद्रणालय भी स्थापित किया। प्रकाशन विभागमें सबसे पहले हिन्दीकेप्रख्यात विद्वान पद्म सिंह शर्माको नियुक्त किया गया जिन्होंने ‘बिहारी सतसई पर सतसई संहार’ नामक समीक्षा ग्रंथ की रचना की। इसके बाद इस विभागका कार्यभार रामदास गौड़ को सौंपा गया। बाद में मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव ने इस विभाग का दायित्व ग्रहण किया। डाक्टर सम्पूर्णानन्द, मुंशीप्रेमचन्द्र आदिका भी सहयोग लिया गया। जनवरी १९५४ में देवनारायण द्विवेदीआमन्त्रित किये गये। इस प्रकार ज्ञानमण्डलमें उच्च स्तरके हिन्दी ग्रंथोंकेप्रकाशनकी शुरुआत हुई। अबतक ज्ञानमण्डलसे जो महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुए, उनका संक्षिप्तविवरण इस प्रकार है- बृहत् हिन्दी कोश- यह हिन्दीका सर्वश्रेष्ठï कोश है। इसकीप्राथमिकता असंदिग्ध है। संशोधित परिवर्धित सातवां संस्करण उपलब्ध है। ज्ञान शब्द कोश- यह वृहत् हिन्दी कोश का संक्षिप्त संस्करण है। जिज्ञासु अध्येताओं के लिए यह उपयोगी है। हिन्दी साहित्य कोश (दो भाग)- इसके अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इसकी उत्कृष्ट प्रस्तुतिके लिए इसे भारत सरकारने प्रथम पुरस्कार प्रदान किया है। अंगेजी-अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश- यह अत्यन्तउपयोगी और प्रमाणिक कोश है। इसका संकलन-सम्पादन अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के कोशकार डाक्टर हददेव बाहरी ने किया है। अंग्रेजी-अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोष(संक्षिप्त संस्करण)- यह उक्त कोशका लघु रूप हैं जो विद्यार्थियों और अध्येताओं के लिए उपयोगी है। वृहद अंग्रेजी-हिन्दी कोश (दो भाग)- इसमें ज्ञान-विज्ञान के सूक्ष्मति सूक्ष्म क्षेत्रों के सरल-जटिल, साहित्यिक और पारिभाषिक शब्दावलियोंकाविवेचनात्मक ढंगसे समावेश किया गया है। यह अत्यन्त उपयेगी कोश है। इसकासंशोधित-परिवर्धित संस्करण उपलब्ध है। पौराणिक कोश- धार्मिक पौराणिक ग्रंथों के सन्दर्भों, पात्रों, स्थानों तथाकथाओंके सम्यक ज्ञानकी दृष्टिïसे यह कोश बहुत ही उपयोगी है। भाषा विज्ञान कोश- डाक्टर भोलानाथ तिवारी कृत यह कोश अपने ढंग का अनूठा है। भाषा विज्ञान के अध्येता के लिए परम उपयोगी और संग्रहणीय है। वाङ्मयार्णव- महामहोपाध्याय पाण्डेय रामावतार शर्मा कृत यह पद्यवद्ध संस्कृत विश्वकोष है। यह संस्कृत वाङ्मयका आमूल्य रत्न है। काव्य प्रकाश- मम्मट कृत मूल्यवान कृति का यह भाष्य है। सभी संस्कृत पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग है। ध्वन्यालोक- ध्वनि सिद्धान्त के अद्वितीय प्रतिपादन-विवेचन में यह संस्कृत का श्रेष्ठ लक्षण ग्रंथ है। (क) निरुक्तम् (पेपर बैंक)- यह निघण्टु के व्यख्या ग्रंथ का श्रेष्ठ विवेचन है। वेद के अर्थ में रुचि रखने वाले विद्वानों और अध्येताओं के लिए उपयोगी ग्रंथ है। (ख) निरुक्तम् (प्रथम अध्याय) सूरसागर- इस ग्रंथकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सूरसागर को मुख्य काव्य वस्तु-श्री कृष्णलीला को उस संशिलट सुगठित कथा-प्रबन्ध के स्वरूप में उद्घाटित किया गया है जो स्वयं इस महान भक्त कवि द्वारा परिकल्पित था। हिन्दुत्व- इस अनुपम ग्रंथ को धर्मकोश की संज्ञा दी गयी है। इसमें हिन्दू धर्म और संस्कृति विषयक समस्त जानकारी उपलब्ध है। यह ग्रंथ पठनीय औरसंग्रहणीय है। अशोक के अभिलेख- डाक्टर राजबली पाण्डेय कृत इस ग्रंथ में सम्राट अशोक के उपलब्ध सभी अभिलेखों का संग्रह एवं विद्वत्तापूर्ण सम्पादन किया गया है। इसमें अभिलेखों के हिन्दी रूपान्तर के साथ पाद टिप्पणियों तथा ऐतिहासिक टिप्पणियों का उल्लेख है। वास्तु मर्म- इस पुस्तक में जन्म-कुण्डली के ग्रहों और वास्तु(भवन) के प्रभाव का प्रामाणिक विवरण है। वास्तु के मूल ग्रंथों समरांगण-सूत्रधार, वास्तु राजल्लभ, मानसार, विश्वकर्मा प्रकाश, वृहत्ï संहिता के भवननिर्माण सम्बन्धी मूल श्लोकों का सानुवाद प्रस्तुतिकरण किया गया है। स्वतन्त्रता संग्राम- प्रस्तुत पुस्तक में स्वातन्त्र्य संघर्ष और उसकी मूलभूत उपलब्धियों का प्रामाणिक विवरण है। राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी और अध्येताओं के लिए यह उपयोगी और संग्रणीय ग्रंथ है। चिद्विलास- इस पुस्तक में विद्वान लेखक डाक्टर सम्पूर्णानन्द ने अद्वैतवा दके गूढ़ रहस्यों का सुबोध शैली में प्रतिपादन-विवेचन किया है। यह केवल पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है। पालि साहित्य का इतिहास- डाक्टर भिक्षु धर्मरक्षित कृत इस पुस्तक में पालि भाषा और साहित्य के प्रामाणिक इतिहास के अतिरिक्त तत्सम्बन्धी अन्य सामग्री भी संकलित है। पालि व्याकरण- पालि भाषा के विद्यार्थियों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी पुस्तक है। इसमें पालि भाषा का व्याकरण सरल और सुबोध ढंग से विवेचन किया गयाहै। महापरिनिब्बान सुत्तं- दीघनिकाय के १६वें सूत्रपर प्रतिपादित इस ग्रंथ को उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने पालि पाठ्ïय पुस्तकके रूपमें स्वीकृत किया है। पालि पाठशाला- पालि साहित्य के जिज्ञासाओं की दृष्टिïसे लिखी गयी यहपुस्तक अपने ढंगकी मौलिक रचना है। समाचार पत्रों का इतिहास- पचास वर्षों तक पत्र और पत्रकारिता से सम्बद्ध मूर्धन्य विद्वान पण्डित अम्बिका प्रसाद बाजपेयी ने इसग्रंथ में भारतीय समाचार पत्रों का एक सौ वर्ष का इतिहास प्रस्तुत किया है। हिन्दी, मराठी, बंगला आदि भाषाओं के पत्रों का कैसा स्वरूप रहा है, उसका विशद्ï ज्ञान इसपुस्तकमें संचित है। मालवीय जी महाराज की छायामें- इस पुस्तक में युग विभूति महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय के महान व्यक्तित्व और कृतित्व सम्बन्धी दुर्लभ संस्मरण है। राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त- तीन खण्डोंमें विभाजित इसपुस्तकमें विदुषी लेखिका डाक्टर ज्योत्सना श्रीवास्तवने राष्ट्ररत्न- श्रीशिवप्रसाद गुप्तके जीवन-दर्शन, उनकी विचारधारा तथा उनके अनुपम राष्ट्रप्रेम का मूल्यांकन किया है। यह पुस्तक राजनीति के विद्यार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है। सूफीमत-साधना और साहित्य- सूफीमत की साधना और तत्सम्बन्धी साहित्य के ज्ञान के लिए यह पुस्तक परम उपयोगी है। इसके अध्ययन से इस्लाम धर्म की उत्पत्ति और व्यक्ति का पर्याप्त ज्ञान हो जाता है।
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आज’ (१९२०)

संस्थापक - राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त

संस्थापना दिवस- ५ सितम्बर, १९२०
आज’ के विस्तारीकरण की प्रक्रिया १९७७ से शुरू हुई। कानपुर से ‘आज’ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके बाद उत्तर प्रदेश में आगरा, गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, बरेली से भी ‘आज’ प्रकाशित होने लगा। बिहार में पटना, रांची, धनबाद, जमशेदपुर से ‘आज’ का प्रकाशन होता है। ‘आज’ के सभी संस्करण कम्प्यूटर, फैक्स, मोडम, इण्टरनेट और अति आधुनिक छपाई मशीनों से लैस हैं। सूचना एवं प्रौद्योगि की के क्षेत्र में जो क्रान्ति आयी है, उससे कदम से कदम मिलाकर ‘आज’ आगे बढ़ रहा है। इसकी प्रसार संख्या निरन्तर बढ़ रही है। सभी संस्करणों में साप्ताहिक विशेषांक नियमित रूप से और विभिन्न विषयों पर परिशिष्ट समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। ‘आज’ ने हमेशा जनता की आवाज बुलन्द की है। आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी। अवरोधों के बावजूद वह कभी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुआ। ‘आज’ आज भी भारतीय जनता की आवाज है।

सन् १९२० में ही यानी आज से ९४ साल पहले ‘आज’ ने अपने एक सम्पादकीय में जो लिखा था, वह आज भी एकदम सत्य है। यह ‘आज’ की परम्परागत दूरदृष्टि का प्रतीक है। सम्पादकीय इस प्रकार है- ‘संसार इस समय बेचैन है। चारों ओर हलचल है। सब नर-नारीपरेशान हैं। क्यों? राष्ट्रनीतिज्ञों को इसका कारण विचार कर निकालना चाहिए। जिधर देखिये उसी ओर अशान्ति विराज रही है। सब लोग एक दूसरे से अप्रसन्न हैं। अपनी-अपनी श्रेणी को संघटित कर सब लोग दूसरी श्रेणियों से लडऩे के लिए तैयार हैं। इस हलचल में केवल एक सिद्धान्त है- जिसके पास अधिकार है, उससे अधिकार ले लेना चाहिए। जिसके पास अधिकार नहीं है, वह दूसरों को अधिकार प्राप्त देखकर जलता है और उसके पास से अधिकार हटवाना चाहता है। अनाधिकारी अधिकारी से द्वेष करता है और अधिकारी अनाधिकारियों की संख्या देख उनसे डरता है, उनकी संघटित शक्ति घटाना चाहता है और उनके प्रति रोष दिखाकर उन्हें अधीन अवस्था में ही पड़े रहने का आदेश देता है। राष्ट्र-राष्ट्र, वर्ग-वर्ग, वर्ण-वर्ण सबके झगड़े का मूल मन्त्र यही प्रतीत होता है कि अधिकारी के पास अधिकार न हो।

अधिकार हटाया जाना चाहिए। तो शान्ति कैसे हो सकती है, चैन कैसे मिल सकता है? शासन और शासित, मालिक और मजदूर, अमीर और गरीब अपने-अपने हक और फर्ज दोनों को जब तक अच्छी तरह नहीं समझते, तब तक नीति नहीं हो सकती। दो परस्पर विरोधी श्रेणियों को यह सच समझना होगा।’

आज’ का नाम ‘आज’ ही क्यों

‘आज’ के नामकरण के बारे में कहा गया- हमारा पत्र दैनिक है। प्रत्येक दिन इसका प्रकाशन होगा। संसार भर केनये-नये समाचार इसमें रहेंगे। दिन-प्रतिदिन संसार की बदलती हुई दशा में नये-नये विचार उपस्थित करने की आवश्यकता होगी। हम इस बात का साहस नहीं कर सकते कि हम सर्वकाल, सर्वदेश, सर्वावस्था के लिए जो उचित, युक्त और सत्य होगा, वही सर्वदा कहेंगे। हमें रोज-रोज अपना मत तत्काल स्थिर करके बड़ी-छोटी सब प्रकार की समस्याओं को समयानुसार हल करना होगा। जिस क्षण जैसी आवश्यकता पड़ेगी, उसी की पूर्ति का उपाय सोचना और प्रचार करना होगा। अतएव हम एक ही रोज की जिम्मेदारी प्रत्येक अंक मेंले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक अंक में ले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक दिन केवल आज की होगी, इस कारण इस पत्र का नाम ‘आज’ है।

कुछ अन्य प्रकाशन

(१) सोमवारविशेषांक- ‘आज’ के सोमवार विशेषांक का प्रकाशन १९४४ में शुरू हुआ।

(२) स्वार्थ-ज्ञानमण्डल से ‘स्वार्थ’ पत्रका प्रकाशन शुरू हुआ था। दो-ढाई वर्ष तक चलने के बाद आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसे बन्द करना पड़ा।

(३) मर्यादा- १९२१ में ज्ञानमण्डल ने इस मासिक पत्रिका का अधिग्रहण किया और श्री सम्पूर्णानन्द के सम्पादकत्व में इसका प्रकाशन शुरू हुआ।

(४) साप्ताहिक ‘आज’- १८ जुलाई, १९३८ सेसाप्ताहिक आजका प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।

(५) समाज- इस का प्रकाशन १९४७ में शुरू हुआ। इसके सम्पादक मण्डल में आचार्य नरेन्द्रदेव भी थे। १अक्तूबर, १९५० से इसका प्रकाशन बन्द कर दिया गया।

(६) चित्ररेखा- यहउ च्च कोटि की कहानी की पत्रिका थी। ज्ञानमण्डल से इसका प्रकाशन नवम्बर, १९४७ में शुरू हुआ। कुछ ही अंक प्रकाशित करने के बाद इसे बन्द कर देना पड़ा।

(७) अंग्रेजीदैनिक ‘टुडे’- ३० जुलाई, १९३१ को इसदैनिकका प्रकाशनारम्भ हुआ था। श्री सम्पूर्णानन्द इसके सम्पादक थे। अपनी छोटी-सीजिन्दगीमें ही यह पत्र अहिन्दी-भाषियों में काफी लोकप्रिय हुआ।

(८) ‘अवकाश’ हिन्दी पाक्षिक-अप्रैल, १९७९ मेंश्रीरामनवमीके दिन श्री शार्दूल विक्रम गुप्तके सम्पदकत्वमें इसका प्रकाशन शुरूहुआ। लगभग दस सालतक यह पत्रिका खूल चली। इसकी प्रसार संख्या सवा लाख तक पहुंच चुकी थी। बाद में इसे बन्द कर दिया गया।

ज्ञानमण्डल (प्रकाशन संस्थान)

राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त के हृदय में हिन्दी के प्रति असीम अनुराग था। उनकी आकांक्षा थी कि विश्व का समस्त ज्ञान हिन्दीमें भी प्रस्तुत किया जायऔर हिन्दी साहित्यकी उन्नतिमें समुचित योगदान करनेके उद्देश्यसे ऐसी संस्थास्थापित की जाय जो एकमात्र इसी उद्देश्यको लेकर प्रकाशन-कार्य आरम्भ करे। अपनी इसआकांक्षाको मूर्तिमान करनेके लिए उन्होंने सन्ï १९१६ मेंज्ञानमण्डल नामक प्रकाशन संस्था की स्थापना की और इस कार्यके लिए ज्ञानमण्डलके हीनामसे एक बड़ा मुद्रणालय भी स्थापित किया। प्रकाशन विभागमें सबसे पहले हिन्दीकेप्रख्यात विद्वान पद्म सिंह शर्माको नियुक्त किया गया जिन्होंने ‘बिहारी सतसई पर सतसई संहार’ नामक समीक्षा ग्रंथ की रचना की। इसके बाद इस विभागका कार्यभार रामदास गौड़ को सौंपा गया। बाद में मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव ने इस विभाग का दायित्व ग्रहण किया। डाक्टर सम्पूर्णानन्द, मुंशीप्रेमचन्द्र आदिका भी सहयोग लिया गया। जनवरी १९५४ में देवनारायण द्विवेदीआमन्त्रित किये गये। इस प्रकार ज्ञानमण्डलमें उच्च स्तरके हिन्दी ग्रंथोंकेप्रकाशनकी शुरुआत हुई। अबतक ज्ञानमण्डलसे जो महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुए, उनका संक्षिप्तविवरण इस प्रकार है-

बृहत् हिन्दी कोश- यह हिन्दीका सर्वश्रेष्ठï कोश है। इसकीप्राथमिकता असंदिग्ध है। संशोधित परिवर्धित सातवां संस्करण उपलब्ध है।

ज्ञान शब्द कोश- यह वृहत् हिन्दी कोश का संक्षिप्त संस्करण है। जिज्ञासु अध्येताओं के लिए यह उपयोगी है।

हिन्दी साहित्य कोश (दो भाग)- इसके अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इसकी उत्कृष्ट प्रस्तुतिके लिए इसे भारत सरकारने प्रथम पुरस्कार प्रदान किया है।

अंगेजी-अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश- यह अत्यन्तउपयोगी और प्रमाणिक कोश है। इसका संकलन-सम्पादन अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के कोशकार डाक्टर हददेव बाहरी ने किया है।

अंग्रेजी-अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोष(संक्षिप्त संस्करण)- यह उक्त कोशका लघु रूप हैं जो विद्यार्थियों और अध्येताओं के लिए उपयोगी है।

वृहद अंग्रेजी-हिन्दी कोश (दो भाग)- इसमें ज्ञान-विज्ञान के सूक्ष्मति सूक्ष्म क्षेत्रों के सरल-जटिल, साहित्यिक और पारिभाषिक शब्दावलियोंकाविवेचनात्मक ढंगसे समावेश किया गया है। यह अत्यन्त उपयेगी कोश है। इसकासंशोधित-परिवर्धित संस्करण उपलब्ध है।

पौराणिक कोश- धार्मिक पौराणिक ग्रंथों के सन्दर्भों, पात्रों, स्थानों तथाकथाओंके सम्यक ज्ञानकी दृष्टिïसे यह कोश बहुत ही उपयोगी है।

भाषा विज्ञान कोश- डाक्टर भोलानाथ तिवारी कृत यह कोश अपने ढंग का अनूठा है। भाषा विज्ञान के अध्येता के लिए परम उपयोगी और संग्रहणीय है।

वाङ्मयार्णव- महामहोपाध्याय पाण्डेय रामावतार शर्मा कृत यह पद्यवद्ध संस्कृत विश्वकोष है। यह संस्कृत वाङ्मयका आमूल्य रत्न है।

काव्य प्रकाश- मम्मट कृत मूल्यवान कृति का यह भाष्य है। सभी संस्कृत पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग है।

ध्वन्यालोक- ध्वनि सिद्धान्त के अद्वितीय प्रतिपादन-विवेचन में यह संस्कृत का श्रेष्ठ लक्षण ग्रंथ है।

(क) निरुक्तम् (पेपर बैंक)- यह निघण्टु के व्यख्या ग्रंथ का श्रेष्ठ विवेचन है। वेद के अर्थ में रुचि रखने वाले विद्वानों और अध्येताओं के लिए उपयोगी ग्रंथ है।

(ख) निरुक्तम् (प्रथम अध्याय)

सूरसागर- इस ग्रंथकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सूरसागर को मुख्य काव्य वस्तु-श्री कृष्णलीला को उस संशिलट सुगठित कथा-प्रबन्ध के स्वरूप में उद्घाटित किया गया है जो स्वयं इस महान भक्त कवि द्वारा परिकल्पित था।

हिन्दुत्व- इस अनुपम ग्रंथ को धर्मकोश की संज्ञा दी गयी है। इसमें हिन्दू धर्म और संस्कृति विषयक समस्त जानकारी उपलब्ध है। यह ग्रंथ पठनीय औरसंग्रहणीय है।

अशोक के अभिलेख- डाक्टर राजबली पाण्डेय कृत इस ग्रंथ में सम्राट अशोक के उपलब्ध सभी अभिलेखों का संग्रह एवं विद्वत्तापूर्ण सम्पादन किया गया है। इसमें अभिलेखों के हिन्दी रूपान्तर के साथ पाद टिप्पणियों तथा ऐतिहासिक टिप्पणियों का उल्लेख है।

वास्तु मर्म- इस पुस्तक में जन्म-कुण्डली के ग्रहों और वास्तु(भवन) के प्रभाव का प्रामाणिक विवरण है। वास्तु के मूल ग्रंथों समरांगण-सूत्रधार, वास्तु राजल्लभ, मानसार, विश्वकर्मा प्रकाश, वृहत्ï संहिता के भवननिर्माण सम्बन्धी मूल श्लोकों का सानुवाद प्रस्तुतिकरण किया गया है।

स्वतन्त्रता संग्राम- प्रस्तुत पुस्तक में स्वातन्त्र्य संघर्ष और उसकी मूलभूत उपलब्धियों का प्रामाणिक विवरण है। राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी और अध्येताओं के लिए यह उपयोगी और संग्रणीय ग्रंथ है।

चिद्विलास- इस पुस्तक में विद्वान लेखक डाक्टर सम्पूर्णानन्द ने अद्वैतवा दके गूढ़ रहस्यों का सुबोध शैली में प्रतिपादन-विवेचन किया है। यह केवल पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है।

पालि साहित्य का इतिहास- डाक्टर भिक्षु धर्मरक्षित कृत इस पुस्तक में पालि भाषा और साहित्य के प्रामाणिक इतिहास के अतिरिक्त तत्सम्बन्धी अन्य सामग्री भी संकलित है।

पालि व्याकरण- पालि भाषा के विद्यार्थियों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी पुस्तक है। इसमें पालि भाषा का व्याकरण सरल और सुबोध ढंग से विवेचन किया गयाहै।

महापरिनिब्बान सुत्तं- दीघनिकाय के १६वें सूत्रपर प्रतिपादित इस ग्रंथ को उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने पालि पाठ्ïय पुस्तकके रूपमें स्वीकृत किया है।

पालि पाठशाला- पालि साहित्य के जिज्ञासाओं की दृष्टिïसे लिखी गयी यहपुस्तक अपने ढंगकी मौलिक रचना है।

समाचार पत्रों का इतिहास- पचास वर्षों तक पत्र और पत्रकारिता से सम्बद्ध मूर्धन्य विद्वान पण्डित अम्बिका प्रसाद बाजपेयी ने इसग्रंथ में भारतीय समाचार पत्रों का एक सौ वर्ष का इतिहास प्रस्तुत किया है। हिन्दी, मराठी, बंगला आदि भाषाओं के पत्रों का कैसा स्वरूप रहा है, उसका विशद्ï ज्ञान इसपुस्तकमें संचित है।

मालवीय जी महाराज की छायामें- इस पुस्तक में युग विभूति महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय के महान व्यक्तित्व और कृतित्व सम्बन्धी दुर्लभ संस्मरण है।

राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त- तीन खण्डोंमें विभाजित इसपुस्तकमें विदुषी लेखिका डाक्टर ज्योत्सना श्रीवास्तवने राष्ट्ररत्न- श्रीशिवप्रसाद गुप्तके जीवन-दर्शन, उनकी विचारधारा तथा उनके अनुपम राष्ट्रप्रेम का मूल्यांकन किया है। यह पुस्तक राजनीति के विद्यार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।

सूफीमत-साधना और साहित्य- सूफीमत की साधना और तत्सम्बन्धी साहित्य के ज्ञान के लिए यह पुस्तक परम उपयोगी है। इसके अध्ययन से इस्लाम धर्म की उत्पत्ति और व्यक्ति का पर्याप्त ज्ञान हो जाता है।

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भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी |

ओजस्वी वक्ता, प्रखर कवि और विरोधियों में भी सम्मान के पात्र रहे राजनेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आज देश के शीर्ष नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रोटोकोल को एक तरफ कर इन दिनों अस्वस्थ चल रहे वाजपेयी के यहां कृष्ण मेनन मार्ग स्थित निवास पर खुद जाकर उन्हें इस पुरस्कार से नवाज़ा। इस अवसर पर वाजपेयी के कुछ नजदीकी संबंधी, उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह आदि उपस्थित थे।



प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इससे पहले ट्वीट किया, ‘‘करोड़ों भारतवासियों के लिए आज ऐतिहासिक दिन है, जब अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न पुरस्कार दिया जाएगा।’’ राष्ट्रपति द्वारा वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री के निवास के लॉन में चाय पार्टी का आयोजन हुआ जिसमें अन्य लोगों के अलावा कुछ केन्द्रीय मंत्रियों और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद सहित कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री उपस्थित हुए।



राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी संक्षिप्त विज्ञप्ति में वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई। वाजपेयी को उनके जन्मदिन से एक दिन पहले 24 दिसंबर को भारत रत्न देने संबंधी निर्णय का ऐलान किया गया था। वाजपेयी बीते साल 25 दिसंबर को 90 साल के हो गए हैं।



पूर्व प्रधानमंत्री के साथ ही प्रसिद्ध शिक्षाविद एवं स्वतंत्रता सेनानी महामना मदन मोहन मालवीय (मरणोपरांत) को भी भारत रत्न देने की घोषणा 24 दिसम्बर को ही की गई थी। इत्तेफाक की बात है कि वाजपेयी और मालवीय दोनों का जन्मदिन 25 दिसंबर है। वाजपेयी का जन्म इस तारीख को 1924 में और मालवीय का जन्म 1861 को हुआ था। महामना का पुरस्कार 30 मार्च को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में उनके परिजनों को दिया जाएगा।

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